Shri Rudrashtakam (श्रीरुद्राष्टकम) with meaning

Aug 27 2016 0 Comments Tags: ashtakam, mantra, Rudra, Shiva, shivlinga, Shivratri, stotram

The Rudrashtakam is an ashtakam or octet (a prayer with eight rhyming verses) dedicated to the manifestation of Shiva. It was composed by Swami Tulsidas in the fifteenth century. Rudra is considered as the fearsome manifestation of Shiva who is to be feared.This eightfold hymn of praise was sung to please Shankara. Lord Shiva will be pleased with whomever heartfully recites it. Rudrashtakam has its origins in the Ramayana, the great Sanskrit epic, written by Goswami Tulsidas(16th century AD) in Varanasi, the city sacred to Lord Shiva. Tulsidasji was writing the Ramcharitmanas in the Kashi Vishwanath Temple in Varanasi, when this hymn singing the glories of Shiva, could be composed due to the grace of Lord Shiva.

Shri Rudrashtakam

 

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे हं॥1॥

Namam Meesana nirvana roopam,Vibhum vyapakam Brahma Veda swaroopam l
Nijam nirgunam nirvikalpam nireeham,Chidakasamaakasa vasam Bhajeham ॥1॥

व्याख्या - हे मोक्षस्वरूप, विभु, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर व सबके  स्वामी श्री शिव जी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ. निजस्वरूप में स्थित अर्थात माया आदि से रहित, गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको भजता हूँ ॥1॥

Meaning - I bow to the Ruler of the Universe, whose very form is Liberation,the omnipotent and all pervading Brahma, manifest as the Vedas. I worship Shiva, shining in his own glory, without physical qualities,Undifferentiated, desireless, all pervading sky of consciousness and wearing the sky itself as His garment. ||1||

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निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो हं॥2॥

Niraakara monkaara moolam thureeyam ,Giraa jnana gotheethamesam gireesam l
Karalam maha kala kalam krupalam,Gunaa gara samsara param athoham ॥2॥

व्याख्या - निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय अर्थात तीनों गुणों से अतीत, वाणी, ज्ञान व इंद्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ ॥2॥

Meaning - I bow to the supreme Lord who is the formless source of “Aum” The Self of All, transcending all conditions and states,
Beyond speech, understanding and sense perception, Awe-full, but gracious, the ruler of Kailash, Devourer of Death, the immortal abode of all virtues. ||2||

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तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥3॥

Thushaaraadhi sankasa gowram gabheeram,Mano bhootha koti prabha sree sareeram l
Sphuran mouli kallolini charu ganga,Lasaddala balendu kante bhujanga.l॥3॥

व्याख्या - जो हिमाचल समान गौरवर्ण व गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा और  गले में सर्प सुशोभित है ॥3॥

Meaning - I worship Shiva, whose form is white as the Himalyan snow, Radiant with the beauty of countless Cupids, Whose head sparkles with river Ganga. With crescent moon adorning his brow and snakes coiling his neck ॥3॥

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चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

Chalath kundalam bru sunethram vishaalam,Prasannananam neela kandam dhayalam l
Mrigadheesa charmambaeam munda malam Priyam shankaram sarva nadham bhajami ॥4॥

व्याख्या - जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटि व विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ व दयालु हैं, सिंहचर्म धारण किये व मुंडमाल पहने हैं, उनके सबके प्यारे, उन सब के नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ ॥4॥

Meaning - The beloved Lord of All, with shimmering pendants hanging from his ears, Beautiful eyebrows and large eyes, Full of Mercy with a cheerful countenance and a blue speck on his throat ॥4॥

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प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे हं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

Prachandam prakrushtam Prakalbham paresam,Akhandam ajam bhanu koti prakasam l
Thraya soola nirmoolanam soola panim,Bhajeham bhavani pathim bhava gamyam ॥5॥

व्याख्या - प्रचण्ड रुद्र रूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों अर्थात दु:खों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ ॥5॥

Meaning - I worship Shankara, Bhavani’s husband,The fierce, exalted, luminous supreme Lord.Indivisible, unborn and radiant with the glory of a million suns; Who, holding a trident, tears out the root of the three-fold suffering,And who is reached only through Love ॥5॥

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कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥6॥

Kalatheetha kalyani kalpanthakari,Sada sajjananda datha purari l
Chidananda sandoha mohapahari,Praseeda praseeda prabho mamamadhari ॥6॥

व्याख्या - कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत, प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिनानंदमन, मोह को हरने वाले, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों ॥6॥

Meaning - You who are without parts, ever blessed, The cause of universal destruction at the end of each round of creation, A source of perpetual delight to the pure of heart,Slayer of the demon, Tripura, consciousness and bliss personified,
Dispeller of delusion Have mercy on me, foe of Lust ॥6॥

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न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

Na yavad Umanada padaravindam ,Bhajantheeha loke pare vaa naraanaam l
Na thath sukham shanthi santhapa nasam,Praseedha prabho Sarva bhoothadhivasam l॥7॥

व्याख्या - हे पार्वती के पति, जब तक मनुष्य आपके चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इस लोक में न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न ही तापों का नाश होता है. अत: हे समस्त जीवों के अंदर निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइये ॥7॥

Meaning - Oh Lord of Uma, so long as you are not worshipped there is no happiness, peace or freedom from suffering in this world or the next. You who dwell in the hearts of all living beings, and in whom all beings have their existence, Have mercy on me, Lord ॥7॥

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न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो॥8॥

Na janami yogam, japam ,naiva poojaam,Nathoham sada sarvadha Shambhu thubhyam l
Jara janma dukhogha thathpyamanam,Prabho pahi aapannamameesa Shambho ॥8॥

व्याख्या - मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा. हे प्रभो, मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ. हे प्रभो, बुढ़ापा व जन्म, मृत्यु, दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा करें. हे ईश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥8॥

Meaning - I don’t know yoga, prayer or rituals, But everywhere and at every moment, I bow to you, Shambhu ! Protect me my Lord, miserable and afflicted as I am with the sufferings of birth, old-age and death ॥8॥

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रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥

Rudhrashtakamidham proktham Viprena hara thoshaye l
Ye padanthi naraa bhakthya thesham Shambhu praseedathi ll

व्याख्या - भगवान रुद्र का यह अष्टक उन शंकर जी की स्तुति के लिये है जो मनुष्य इसे प्रेमस्वरूप पढ़ते हैं, श्रीशंकर उन से प्रसन्न होते हैं

Meaning - Lord Rudra's this ashtakam is for the worship of supreme lord Shiva. The person who chants / reads ashtakam Lord Shiva remains happy with him.

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इति श्री गोस्वामी तुलसिदास कृतम श्रीरुद्राश्ह्टकम संपूर्णम॥

Here ends Sri Goswami Tulsidasa composed Shri Rudra ashtakam ॥

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